माँ तो होती ही है-बहनें भी कई बार माँ-सा आँचल फैला देती हैं...
विवाह के बाद पत्नी भी दुलार में ममता घोल देती है,
और बड़ी होती बेटियाँ पिता की थकान में माँ का स्पर्श भर देती हैं...
पर स्त्रियों के हिस्से बस एक ही बार माँ आती है,
एक घर, एक आँगन, एक आवाज़ जो नाम लेकर पुकारती है....
उसका भी एक समय होता है,
मायके की दहलीज़ लाँघते ही जैसे बचपन की चूड़ियाँ धीरे-धीरे उतर जाती हैं...
फिर वह स्त्री सबकी माँ बनती है,
सबकी देखभाल करती है पर उसके सिर पर वैसा हाथ कभी-कभी ही लौटता है...
वह उम्र भर दूसरों को गोद देती है,
पर खुद के लिए एक गोद तरसती है-जहाँ बिना मजबूत बने वो रो सके..
स्त्री के हिस्से की माँ एक ही बार आती है,
और उसके जाने के बाद वह खुद ही अपनी माँ बनना सीख जाती है...।










