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@traddigvijayपब्लिक चैनल

卐 शङ्करस्य शासनम् 卐 ॥ परंपरावाद ● मनुवाद ● राजतन्त्र ● वर्णाश्रम ॥ नोट:- यहाँ हर प्रकार की बीमारी-मानसिक कोढ़/विक्षिप्तता/दिवालियेपन का उपचार किया जाता है। शास्त्रसर्वोपरि!

धर्महिन्दीभारत

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Apr 11, 2026
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चैनल जानकारी

चैनल जानकारी
चैनल का नामTrad Digvijaya
यूज़रनेम@traddigvijay
श्रेणीधर्म
भाषाहिन्दी
देशभारत
सदस्य1,821
चैनल प्रकारपब्लिक चैनल
बनाया गया11 अप्रैल 2026
आखिरी अपडेट15 अक्टू॰ 2026 • 6 दिन पहले
स्थितिसक्रिय

रैंकिंग

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#208264+27
भाषा रैंकिंग
#1375+6
श्रेणी रैंकिंग
#3959-14

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12 अक्टू॰ 2026, 23:23

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🌺 सनातनी मातृशक्तियों (कुमारियों/नारियों) द्वारा भगवतीके प्रीत्यर्थ 'दाण्डिया-गरबा'रूप मण्डलाकार-नृत्य अतिप्राचीन शास्त्रीय परम्परा है!

हर्षप्रदा हविर्भोक्त्री हार्दसंतमसापहा। ‘हल्लीसलास्यसंतुष्टा’ हंसमन्त्रार्थरूपिणी॥
(श्रीललितात्रिशतीस्तोत्रम्, ३२)

हल्लीसलास्यसंतुष्टा। हल्लीसैः चित्रदण्डैः कुमारिकाभिः एकतालादियुक्तगीतपूर्वकं यल्लास्यं नर्तनं तस्मिन् संतुष्टा प्रीतिमतीत्यर्थः। ‘नारीणां मण्डलीनृत्यं बुधा हल्लीसकं विदुः’ इति हारावलीकोशात् मण्डलाकारनृत्यसंतुष्टत्यर्थः॥
(शिवावतार श्रीशंकराचार्यकृत श्रीललितात्रिशतीभाष्यम्)

कुमारिकाओं द्वारा एकतालादि युक्त गीतोंके साथ किये जाने वाले हल्लीस (दाण्डिया) नामक मण्डलाकार नृत्य से सन्तुष्ट होने वाली भगवती श्रीललिता को हमारा प्रणाम है।

[ 🚩सावधानी~ परन्तु इसमें शास्त्रीय-परिधानमें सनातनी सती-साध्वी-सदाचारनिष्ठ मातृशक्ति ही सम्मिलित हों; पुरुषोंका किसीभी प्रकार प्रवेश वर्जित हो! क्योंकि 'कुमारिकाभिः' पदसे इतरव्यावृत्ति स्वतः सिद्ध है। सद्यःस्थितिमें दाण्डिया-गरबा का जैसा विकृत-स्वरूप हो चुका है उससे रक्षा हेतु यह परमावश्यक है, जिससे इसकी शास्त्रीयमर्यादा सुरक्षित रहे। ]
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11 अक्टू॰ 2026, 23:41

Photo1/8
श्रीशरन्नवरात्रमहामहोत्सव की समस्त सनातनवैदिकधर्म्मावल्मबियों को अनन्तानन्त मङ्गलकामनाएँ 🌺

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥
– श्रीश्रीदुर्गासप्तशती, ५.८१उत्तरार्ध

वह कल्याणकी साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मंगल करे तथा सारी आपत्तियोंका नाश कर डाले।

श्रीमात्रे नमः।
नमश्चण्डिकायै।
हर हर शंकर। जय जय शंकर॥
श्रीराम जय राम जय जय राम॥
हर हर महादेव।

@Dharmveer_Dal
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03 अक्टू॰ 2026, 00:17

सनातन-ध्वज 🚩 is now available at

https://shop.adityavahini.org/

🪔 Pre-Orders are Open ✅

हर घर और हर मंदिर में सनातन धर्म-ध्वज लहराए।

Let the Sanatan Dharma-Dhwaja grace every home and temple.

Deliveries will commence from Navratri (11th October 2026)

#HarGharSanatanDhwaj
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27 सित॰ 2026, 19:55

Video
स्वास्तिक-चिह्नित सूर्य-अङ्कित केसरिया ध्वज लहराएँगे।
हम भारत भव्य बनाएँगे, हम हिन्दुराष्ट्र बनाएँगे॥
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27 सित॰ 2026, 19:46

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श्रीऋग्वेदीय-पूर्वाम्नाय श्रीपुरुषोत्तमपुरीक्षेत्रस्थ
श्रीगोवर्द्धनमठ-भोगवर्द्धनपीठ में लहराता हुआ
विश्वका सबसे ऊँचा सनातन-वैदिक-आर्य-हिन्दु-
धर्मध्वज (वैदिक हिन्दु-राष्ट्रध्वज) !

ध्वजो धूयतां धर्मसङ्घस्य लोके ! 🚩
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06 सित॰ 2026, 21:00

Photo
🌞 भगवत्पाद श्रीशिवावतार जगद्गुरु आद्य श्रीशङ्कराचार्य भगवान् का २५३३वाँ प्राकट्योत्सव इस वर्ष वैशाख-शुक्लपक्ष, पञ्चमी तदनुसार— २१ अप्रैल, २०२६, मङ्गलवार को मनाया जाएगा।

चतुर्भिः सह शिष्यैस्तु शङ्करोऽवतरिष्यति।
शङ्करः शङ्करः साक्षाद्व्यासो नारायणो हरिः॥

हर हर शङ्कर, जय जय शङ्कर 🚩
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06 सित॰ 2026, 21:00

Photo
काशी प्रवास

ऋग्वेदीय-पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सान्निध्य में

दर्शन एवं सङ्गोष्ठी –

17 से 19 अप्रैल, 2026
पूर्वाह्न - 11:30 बजे
सायं - 05:00 बजे


साधना एवं राष्ट्ररक्षा शिविर –

20 से 22 अप्रैल, 2026
प्रातः - 10:00 बजे से
सायं - 05:00 बजे से


आद्य श्रीशङ्कराचार्य जयन्ती –

श्रीशङ्कराचार्य भगवान् का 2533वाँ प्राकट्यमहोत्सव : वैशाख शुक्लपक्ष पञ्चमी (21 अप्रैल, 2026)


श्रीदक्षिणामूर्ति प्राणप्रतिष्ठा –

23 अप्रैल, 2026 – प्रातः 10:30 बजेसे

स्थल – पूर्वाम्नाय श्रीदक्षिणामूर्तिमठ, श्रीजगन्नाथ गली, असि, काशी, वाराणसी
https://maps.app.goo.gl/pTyCX4L6zCHQXvYWA

हिन्दूराष्ट्र भारतवर्ष की जय !
हिन्दूराष्ट्र भारतवर्ष की जय !
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06 सित॰ 2026, 21:00

राजा को चाहिए कि वह दैविक उत्पातों की चिन्ता करनेवालों ने जो कहा है उसको आदरपूर्वक श्रवण करे, कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि योग, क्षेम उनके अधीन है। राजा अग्निशाला में गृहशांति, पुण्याह, स्वस्त्ययन, आयुर्वृद्धि और मंगलदायक कार्य, नान्दीमुख समयानुसार करता रहे तथा अपने शत्रुओं की पराजय, उनके विनाश और उनको पीडा देने वाले कर्मों का भी अनुष्ठान राजा करता रहे तथा अन्य कर्मों को राजा अपने ऋत्विजों की आज्ञा के अनुसार करे।।

गौतम स्मृति, अध्याय 11
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06 सित॰ 2026, 21:00

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ब्राह्मण के अतिरिक्त राजा सभी का ईश्वर है, वह सर्वदा लोगों का हित करता रहे; सर्वदा मधुर वचन कहता रहे, कर्मकांड और ब्रह्मविद्या में शिक्षित, शुद्ध, जितेंद्रिय और गुणवान् सहायकों वाला राजा सम्पूर्ण प्रजा में समदर्शी रहते हुए उचित उपायों द्वारा उनका हित करता रहे। सबसे ऊँचे आसन पर बैठे हुए उस राजा की ब्राह्मण के अतिरिक्त और सब जातियाँ सेवा करें तथा ब्राह्मण भी उसका सम्मान करें। जो चारों वर्णों की न्याय से रक्षा करे और आप भी धर्ममार्ग में स्थित रह कर धर्मपथ से स्खलित लोगों को उनके धर्म पर स्थापित करे, वही राजा धर्म के अंश का भागी कहा गया यह बात शास्त्र से जानी गयी है। विद्या, देश, वाणी, रूप, अवस्था, शीलवान्, न्याययुक्त तपस्वी जो ब्राह्मण है उसे राजा अपना पुरोहित बनाए, क्षत्रिय ब्राह्मण के वचनों अनुसार कर्मों को करता रहे, कारण कि ब्राह्मण का अनुगामी क्षत्रिय बढ़ता है और दु:खी नहीं होता, यह शास्त्र के अनुसार जाना गया है।
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06 सित॰ 2026, 21:00

॥ श्रीहरिः ॥
॥ जय श्रीजगन्नाथ ॥

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।
श्रीमन्नारायणाय नमः। श्रीशङ्कराय नमः।
श्रीमात्रे नमः।
श्रीभास्कराय नमः।
श्रीसुब्रह्मण्याय नमः।

☀️ वर्तमान कल्पके १ अरब ९७ कोटि २९ लक्ष ४९ सहस्र १२७ वर्षोंसे पुष्पित, पल्लवित 'नारायणसमारम्भाम्...' गुरूपरम्परामें आस्थान्वित समस्त सनातनी-वैदिक-आर्य-हिन्दुओंको नूतनवर्षाभिनन्दन। सनातन नववर्ष समस्त सनातनधर्मावलम्बियों हेतु शुभप्रद सिद्ध हो।

🌸 आप सभी को चैत्रशुक्ल प्रतिपदासे नवीन- 'रौद्र' संज्ञक विक्रमसम्वत् २०८३, 'पराभव' संज्ञक शक्सम्वत् १९४८ तथा सनातन सृष्टिसंवत्सर १,९७,२९,४९,१२७ के शुभारम्भ एवं वासन्तिक-नवरात्रा - श्रीश्रीललितानवरात्र व रक्तदन्तिकापूजा की अनन्तानन्त मङ्गलकामनाएँ।

ब्रह्मविद्यासम्प्रदायके कर्ता, भर्ता एवं संरक्षक भगवान् श्रीमन्नारायण एवं उनके अभिन्नस्वरूप भगवान् सदाशिव (श्रीदक्षिणामूर्ति)से आरम्भ होने वाली एवं श्रीब्रह्मा, श्रीवसिष्ठ, श्रीशक्ति, श्रीपराशर, श्रीबादरायण-कृष्णद्वैपायन-वेदव्यास, श्रीशुकदेव, श्रीगौडपादाचार्य, श्रीगोविन्दभगवत्पाद, भगवत्पाद शिवावतार श्रीशङ्कराचार्य, श्रीपद्मपादाचार्यादि अमलात्मापरमहंसमहामुनीन्द्रों, सिद्धों, ब्रह्मात्मतत्त्ववेत्ताओं द्वारा प्रवर्तित; अबतक १५५ गुरुओंकी इस अनाद्यविच्छिन्नगुरुपरम्परामें जहाँ औपनिषद्ब्रह्मविद्या अपने वास्तविक स्वरूपमें सुस्थित है और जो सदासे सकललोककल्याणार्थतत्पर है, ऐसी अभ्युदय-निःश्रेयसप्रद एवं धर्मग्लान्यधर्माभ्युत्थाननिवृत्तिपूर्वक धर्मसंस्थापनार्थ निरन्तर सङ्घर्षरत इस गुरुपरम्परा का नूतनवर्ष आरम्भ हो रहा है। यह नूतनवर्ष इस गुरुपरम्परामें आस्थान्वित सज्जनों हेतु धर्म, अध्यात्म, भक्ति, विरक्ति एवं भगवत्प्रबोधकी प्राप्तिमें अग्रसर करने वाला सिद्ध हो। आपका जीवन अपने और सबके हितमें प्रयुक्त तथा विनियुक्त हो। नारायण।

सर्वेषां मङ्गलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
(श्रीगरुडमहापुराण, उत्तरखण्ड(२), ३५.५१)
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06 सित॰ 2026, 21:00

🌺 नवसंवत्सर की हार्द्दिक मङ्गलकामनाएँ 🌺

शम्भुं विष्णुं च सूर्यं च
देवीं गणपतिं तथा ।
पञ्चायतनपूजाभिः
स्मार्तधर्मः प्रवर्धताम् ॥

भगवान् शम्भु (श्रीशिव), भगवान् श्रीविष्णु, भगवान् श्रीसूर्य, श्रीदेवी (आदिशक्ति) और भगवान् श्रीगणपति — इन पञ्चदेवों की पञ्चायतन-पूजा के द्वारा स्मार्त धर्म की उन्नति हो।

वेदवेदान्तसिद्धान्तः
श्रुतिस्मृतिपुरःसरः ।
नववर्षे प्रबुद्धोऽयं
धर्ममार्गः प्रकाशताम् ॥

वेद और वेदान्त का सिद्धान्त, जो श्रुति और स्मृति के मार्ग का अनुसरण करता है — वह धर्ममार्ग इस नववर्ष में जागृत होकर प्रकाशित हो।

भजामि शंकराचार्यं
अद्वैतामृतवर्षिणम् ।
यत्पादाम्भोजशरणं
मोक्षमार्गप्रदायकम् ॥

मैं शिवावतार जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य का भजन करता हूँ, जो अद्वैत रूपी अमृत की वर्षा करने वाले हैं; जिनके चरणकमलों की शरण मोक्ष का मार्ग प्रदान करती है।

शरणं ते जगद्गुरो
शंकराचार्य सर्वदा ।
नवसंवत्सरेऽस्माकं
बुद्धिर्भवतु शाश्वती ॥

हे जगद्गुरु शंकराचार्य! हम सदा आपकी शरण में हैं। इस नवसंवत्सर में हमारी बुद्धि स्थिर, शाश्वत और विवेकयुक्त हो।

भवतु ब्रह्मनिष्ठा नः
भवतु श्रुतिसेवना ।
सदाचाररतिः स्थेयं
शान्तिर्भूयात् पुनः पुनः ॥

हममें ब्रह्मनिष्ठा हो; श्रुति-सेवा (वेदाध्ययन एवं पालन) हो; सदाचार में स्थिर प्रेम हो; और बार-बार शांति की स्थापना होती रहे।
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13 अग॰ 2026, 15:47

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☀️ समस्त सनातनवैदिकधर्म्मावलम्बियों को सहर्ष सूचित किया जाता है कि –

अनन्तश्रीसमलङ्कृत अभिनवशङ्कर यतिचक्रचूडामणि राजराजेश्वर विश्ववन्द्य सर्वभूतहृदय श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ वेदभाष्यकार धर्मसम्राट् स्वामी श्रीहरिहरानन्दसरस्वतीजी 'श्रीकरपात्रीजी' महाभाग का ११९वाँ प्राकट्यमहोत्सव

आगामी श्रावणशुक्ल द्वितीया - शुक्रवार,
तदनुसार - १४ अगस्त २०२६
को मनाया जाएगा।

धर्मब्रह्मशरीराय करपात्रमहात्मने।
वेदोद्धारप्रवृत्ताय नित्याय गुरवे नम:॥ 🪷🙏🏻
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24 जुल॰ 2026, 01:08

Video
जब नाम होकर जिह्वा पर आवेंगे तब भगवान्‌का आस्वादन होगा। आपको सुनाया-हमारे एक महात्मा हुए हैं श्रीरूपगोस्वामीजी महाराज ! वे कहते हैं कि भगवान्‌के नाम में इतना स्वाद है, इतना स्वाद ! आप जरा स्वाद लेते हुए नामका उच्चारण अपने मन में कीजिये। नाम में कितना स्वाद है, वे बोलते हैं-

तुण्डे ताण्डवीनि रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये, कर्णक्रोडकडम्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम् । चेतः प्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं, नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥

जब हमारे मुख में भगवान्‌का नाम ताण्डव नृत्य करने लगता है-वह परा वाली बात ज्ञानी लोग जानें और पश्यन्ती वाली बात योगी लोग जानें और मध्यमा वाली बात धर्मात्मा लोग जानें! जब मध्यमा से जप होने लगता है तब वैखरी से छूट जाता है। जब पश्यन्ती से जप होने लगता है तब मध्यमा और वैखरी से छूट जाता है और जब परा से जप होने लगता है तो पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी से छूट जाता है! भक्तों ने कहा है कि यह नाम कहीं से छूट जाता है तो हमने उस साधना-पद्धतिको हाथ जोड़ा। हमको नहीं चाहिये परा, नहीं चाहिये पश्यन्ती, नहीं चाहिये मध्यमा। जिस समय वैखरी से नामोच्चारण होता है, उस समय मध्यमा, पश्यन्ती और परा-इन तीनों से होता-ही-होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। बिना परा से हुए पश्यन्ती से नहीं होगा, बिना पश्यन्ती से हुए मध्यमा से नहीं होगा, बिना मध्यमा से हुए वैखरी से नहीं होगा। वह तो जीभ पर जब नामोच्चारण होगा तो परा, पश्यन्ती और मध्यमाकी प्रक्रिया से ही तो वैखरी वाणी में आवेगा। इसलिये, हाथ जोड़ लिया हमने ज्ञान, योग और धर्मकी प्रक्रियाको ! हम तो चिल्लाते हैं भगवान्‌का नाम । हमारी जिह्वा पर भगवान्‌का नाम ताण्डव नृत्य करता है।
'ताण्डव-नृत्य' का अर्थ है कि जल्दी-जल्दी और जोर-जोर से बोलना । जो जानते हैं मध्यमा, पश्यन्ती, पराको वे जानें। हम यह जानते हैं कि जबवैखरी से नामोच्चारण होता है तो बाकी जो सूक्ष्म तीन वाणियाँ हैं, वे क्रियाशील रहती हैं। निष्क्रिय रह ही नहीं सकतीं।
'तुण्डे ताण्डवीनि रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये ।'
जब भगवान्‌का नाम शंकरजीकी तरह ताण्डव नृत्यके स्वर में जिह्वा पर नाचता है तो मन यही होता है कि एक मुख नहीं, हजार मुख होते! भले लोग हमको दशानन कहें, मंजूर है! भले हमको लोग शतानन कहें, मंजूर है ! सहस्रानन कहें, मंजूर है। परन्तु, हमारे हजारों मुँह हों और उनसे हम भगवान्‌का नाम राम, राम, राम; कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण उच्चारण करें। क्योंकि, बड़ा स्वाद आता है। अच्छे काममें भला तृप्ति किसको नहीं होती है ?
'कर्णक्रोडकडम्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम् ।'
और, कानकी गोद में जब नाम आकर निवास करता है, जब सुनने लगते हैं-कोई कीर्तन कर रहा है! अरे, वह कीर्तन नहीं कर रहा है! वह अपने हृदय में भरे हुए नामामृतको उड़ेल-उड़ेलकर पिलाता है। उसका स्वाद लो न ! कथा में बैठोगे और दूकानकी बात सोचोगे तो कथाका स्वाद नहीं आवेगा । नामका उच्चारण करोगे और बात दूसरी सोचोगे तो नामका स्वाद नहीं आवेगा। जब कानके छिद्र में नामामृत प्रवेश करता है-रस, रस, रस भर जाता है ! यह आनन्द स्वरूप है। ब्रह्मका लक्षण है, आनन्द ।
'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ।
(तैत्तिरीय उपनिषद्)
'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।' ( तैत्तिरीय उपनिषद्.)
आनन्द से ही वस्तुओंकी उत्पत्ति होती है।
तो जिस समय कान में यह आनन्दामृत, नामामृत उड़ेला जाता है; उस समय यही इच्छा होती है कि जैसे शेष भगवान्‌के हजारों कान हैं, वैसे हमारे हजारों कान हो जायें और उनसे हम भगवद्-नामामृतका श्रवण करें। धरती पर बैठे हैं-धरतीके कण-कण में से नामकी आवाज हो रही है। जलके तरङ्ग-तरङ्ग में नाम भरा हुआ है। संसारकी प्रत्येक वस्तु नामके द्वारा रूपायित हो रही है। नामकी हवा बह रही है। नामकी बांसुरी गूँज रही है। नाम में बैठे हैं, नाम में सोये हैं, नाम में चलते हैं। अरबों नाम हमको चारों ओर से घेरे हुए हमारे कान में प्रवेश कर रहे हैं।
'चेतः प्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिम्'
चित्त में 'कृष्ण' नामका स्मरण होता है तब सब इन्द्रियोंका कर्तृत्व वहीं सिमट जाता है। बाहर न कुछ देखनेकी इच्छा होती, न सुननेकी, न छूनेकी, न सूँघनेकी, न चखनेकी, न चलने-फिरनेकी और न कुछ करनेकी ही।

'नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी'।
पता नहीं 'कृष्ण' ये दो अक्षर कितने अपार अमृत से उत्पन्न हुए हैं।
देखो, नाम रूपको अपनी गोद में लेकर आता है। शब्दके पेट में रूप रहता है। शब्द बीज है और रूप अंकुर है। प्रत्येक शब्दरूप बीज में से एक रूपांकुरका जन्म होता है। तो जब नामका आप उच्चारण करेंगे-यह जीभ में से आपके हृदय में जायेगा। हृदयके लिये बड़ा हितकारी और वहाँ जाकर चिपक जायेगा।

~नाम महिमा (अखण्डानन्द सरस्वती जी)
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21 जुल॰ 2026, 20:15

Photo1/4
गुरुपूर्णिमा महोत्सव एवं चातुर्मास्यव्रत-निमन्त्रणपत्र
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03 मई 2026, 10:44

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॥ जय श्रीजगन्नाथ ॥ ॥ श्रीहरिहरौ विजयतेतराम् ॥ महत्त्वपूर्ण सूचना :– सन् 1484 में मेहमूद बेगाड़ द्वारा ध्वस्त किए गए देवालयके पुनर्निर्माणका कार्य सकलकल्याणस्वरूप, साक्षाच्छ‌ङ्कररूप, धर्मब्रह्मके मूर्तिमान् विग्रह, पूज्यपादधर्महृदयमहाभाग श्रीसद्गुरुदेव भगवान्…
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