
जब नाम होकर जिह्वा पर आवेंगे तब भगवान्का आस्वादन होगा। आपको सुनाया-हमारे एक महात्मा हुए हैं श्रीरूपगोस्वामीजी महाराज ! वे कहते हैं कि भगवान्के नाम में इतना स्वाद है, इतना स्वाद ! आप जरा स्वाद लेते हुए नामका उच्चारण अपने मन में कीजिये। नाम में कितना स्वाद है, वे बोलते हैं-
तुण्डे ताण्डवीनि रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये, कर्णक्रोडकडम्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम् । चेतः प्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं, नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी ॥
जब हमारे मुख में भगवान्का नाम ताण्डव नृत्य करने लगता है-वह परा वाली बात ज्ञानी लोग जानें और पश्यन्ती वाली बात योगी लोग जानें और मध्यमा वाली बात धर्मात्मा लोग जानें! जब मध्यमा से जप होने लगता है तब वैखरी से छूट जाता है। जब पश्यन्ती से जप होने लगता है तब मध्यमा और वैखरी से छूट जाता है और जब परा से जप होने लगता है तो पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी से छूट जाता है! भक्तों ने कहा है कि यह नाम कहीं से छूट जाता है तो हमने उस साधना-पद्धतिको हाथ जोड़ा। हमको नहीं चाहिये परा, नहीं चाहिये पश्यन्ती, नहीं चाहिये मध्यमा। जिस समय वैखरी से नामोच्चारण होता है, उस समय मध्यमा, पश्यन्ती और परा-इन तीनों से होता-ही-होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। बिना परा से हुए पश्यन्ती से नहीं होगा, बिना पश्यन्ती से हुए मध्यमा से नहीं होगा, बिना मध्यमा से हुए वैखरी से नहीं होगा। वह तो जीभ पर जब नामोच्चारण होगा तो परा, पश्यन्ती और मध्यमाकी प्रक्रिया से ही तो वैखरी वाणी में आवेगा। इसलिये, हाथ जोड़ लिया हमने ज्ञान, योग और धर्मकी प्रक्रियाको ! हम तो चिल्लाते हैं भगवान्का नाम । हमारी जिह्वा पर भगवान्का नाम ताण्डव नृत्य करता है।
'ताण्डव-नृत्य' का अर्थ है कि जल्दी-जल्दी और जोर-जोर से बोलना । जो जानते हैं मध्यमा, पश्यन्ती, पराको वे जानें। हम यह जानते हैं कि जबवैखरी से नामोच्चारण होता है तो बाकी जो सूक्ष्म तीन वाणियाँ हैं, वे क्रियाशील रहती हैं। निष्क्रिय रह ही नहीं सकतीं।
'तुण्डे ताण्डवीनि रतिं वितनुते तुण्डावलीलब्धये ।'
जब भगवान्का नाम शंकरजीकी तरह ताण्डव नृत्यके स्वर में जिह्वा पर नाचता है तो मन यही होता है कि एक मुख नहीं, हजार मुख होते! भले लोग हमको दशानन कहें, मंजूर है! भले हमको लोग शतानन कहें, मंजूर है ! सहस्रानन कहें, मंजूर है। परन्तु, हमारे हजारों मुँह हों और उनसे हम भगवान्का नाम राम, राम, राम; कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण उच्चारण करें। क्योंकि, बड़ा स्वाद आता है। अच्छे काममें भला तृप्ति किसको नहीं होती है ?
'कर्णक्रोडकडम्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम् ।'
और, कानकी गोद में जब नाम आकर निवास करता है, जब सुनने लगते हैं-कोई कीर्तन कर रहा है! अरे, वह कीर्तन नहीं कर रहा है! वह अपने हृदय में भरे हुए नामामृतको उड़ेल-उड़ेलकर पिलाता है। उसका स्वाद लो न ! कथा में बैठोगे और दूकानकी बात सोचोगे तो कथाका स्वाद नहीं आवेगा । नामका उच्चारण करोगे और बात दूसरी सोचोगे तो नामका स्वाद नहीं आवेगा। जब कानके छिद्र में नामामृत प्रवेश करता है-रस, रस, रस भर जाता है ! यह आनन्द स्वरूप है। ब्रह्मका लक्षण है, आनन्द ।
'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ।
(तैत्तिरीय उपनिषद्)
'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।' ( तैत्तिरीय उपनिषद्.)
आनन्द से ही वस्तुओंकी उत्पत्ति होती है।
तो जिस समय कान में यह आनन्दामृत, नामामृत उड़ेला जाता है; उस समय यही इच्छा होती है कि जैसे शेष भगवान्के हजारों कान हैं, वैसे हमारे हजारों कान हो जायें और उनसे हम भगवद्-नामामृतका श्रवण करें। धरती पर बैठे हैं-धरतीके कण-कण में से नामकी आवाज हो रही है। जलके तरङ्ग-तरङ्ग में नाम भरा हुआ है। संसारकी प्रत्येक वस्तु नामके द्वारा रूपायित हो रही है। नामकी हवा बह रही है। नामकी बांसुरी गूँज रही है। नाम में बैठे हैं, नाम में सोये हैं, नाम में चलते हैं। अरबों नाम हमको चारों ओर से घेरे हुए हमारे कान में प्रवेश कर रहे हैं।
'चेतः प्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिम्'
चित्त में 'कृष्ण' नामका स्मरण होता है तब सब इन्द्रियोंका कर्तृत्व वहीं सिमट जाता है। बाहर न कुछ देखनेकी इच्छा होती, न सुननेकी, न छूनेकी, न सूँघनेकी, न चखनेकी, न चलने-फिरनेकी और न कुछ करनेकी ही।
'नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्णद्वयी'।
पता नहीं 'कृष्ण' ये दो अक्षर कितने अपार अमृत से उत्पन्न हुए हैं।
देखो, नाम रूपको अपनी गोद में लेकर आता है। शब्दके पेट में रूप रहता है। शब्द बीज है और रूप अंकुर है। प्रत्येक शब्दरूप बीज में से एक रूपांकुरका जन्म होता है। तो जब नामका आप उच्चारण करेंगे-यह जीभ में से आपके हृदय में जायेगा। हृदयके लिये बड़ा हितकारी और वहाँ जाकर चिपक जायेगा।
~नाम महिमा (अखण्डानन्द सरस्वती जी)