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सत्य का खोजी (Seeker Of Truth)

@satyakakhojiपब्लिक चैनल

परम सत्य के पिपासुओ (मुमुक्षुओं) के लिए...... Quotes, books, audio, video स्वयं की खोज में हुं शांत एवं मौन मैं हुं पथिक हुं सत्य पथ का मैं स्वयं मे ही व्यस्त हुं मीराबाई चैनल - @meera_bai

धर्महिन्दीभारत

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Oct 10, 2025
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चैनल जानकारी

चैनल जानकारी
चैनल का नामसत्य का खोजी (Seeker Of Truth)
यूज़रनेम@satyakakhoji
श्रेणीधर्म
भाषाहिन्दी
देशभारत
सदस्य223
चैनल प्रकारपब्लिक चैनल
बनाया गया10 अक्टू॰ 2025
आखिरी अपडेट19 अक्टू॰ 2026 • 4 दिन पहले
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  1. #1#Nisargadatta_Maharaj #Guru540
  2. #2अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।532
  3. #3सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।522
  4. #4सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।514
  5. #5🌷 #Ramana_Maharshi 🌷488
  6. #6ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।476
  7. #7श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैतत्प्रधार्यताम् ।467
  8. #8#Dongreji_Maharaj #Guru458
  9. #9संसार में सत्य के विपरीत ले जाने वाली कोई वस्तु यदि है तो वह कामना है।437
  10. #10#taittirīya #Upanishad #Vedanta434

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कुतार्किकभेददृष्टिं नास्तिककुदृष्टिं चोज्झित्वा मातृपितृसहस्त्रेभ्योऽपि हितैषणा वेदेनोपदिष्टमात्मैकत्वदर्शनं शान्तदर्पैरादरणीयमित्यर्थ: ।
(कठोपनिषद् शांकरभाष्य २.१.१५)
कुतार्किकों की भेददृष्टि और नास्तिकों की कुदृष्टि का त्याग कर सहस्त्रों माता-पिता से भी अधिक हित चाहने वाले वेद के द्वारा उपदेश किये गए आत्मैकत्व दर्शन का ही निरभिमान होकर आदर करना चाहिए ।
210003
अहो ! अतिगम्भीरा दुरवगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसतत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णाति, अनात्मानं देहेन्द्रियादिसङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोकोऽयं बम्भ्रमीति ।
(कठोपनिषद् शांकरभाष्य १.३.१२)

अहो ! यह माया अति गम्भीर, दुर्गम और विचित्र है, जिससे कि ये संसार के सभी जीव वस्तुतः परमार्थ स्वरूप होने पर भी [ शास्त्र और आचार्य द्वारा ] वैसा बोध कराये जाने पर भी 'मैं परमात्मा हूँ' इस तत्त्व को ग्रहण नहीं कर पाते। इसके विपरीत देह और इन्द्रियादि संघात, घटादि दृश्य के समान आत्मा के दृश्य होते हुए भी किसी के उपदेश किये हुए बिना ही देहात्मबुद्धि कर 'मैं उसका पुत्र हूँ' इत्यादि प्रकार से आत्मबुद्धि करते रहते हैं। नि:सन्देह, उस परमात्मा की माया से ही यह सारा जगत् अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है।
250004
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥

सत्य ही पृथ्वी को धारण करता है।
सत्य से ही सूर्य तपता है।
सत्य से ही वायु बहती है।
सब कुछ सत्य में ही प्रतिष्ठित है।
522006
Photo
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।
(श्रीमद्भगवद्गीता ५.३)
He who does not hate and does not crave should be known as a man of constant renunciation.

#Gita #Bhagwan #Shri_Krishna
476003
श्रीशंकराचार्य कृत एकश्लोकी

किं ज्योतिस्तवभानुमानहनि मे रात्रौ प्रदीपादिकं
स्यादेवं रविदीपदर्शनविधौ किं ज्योतिराख्याहि मे ।
चक्षुस्तस्य निमीलनादिसमये किं धीर्धियो दर्शने
किं तत्राहमतो भवान्परमकं ज्योतिस्तदस्मि प्रभो ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ एकश्लोकी सम्पूर्णा ॥


Is it your light that shines in the day as the sun and as the bright
lamp in the night? Let it be. Which light shines when i close my eyes?
(in mental vision) Which light illumines in my intellctual perception?
You are that supreme light that illumines the awareness of aham' and
I am that light. In short that thou art' or `ahambrahmasmi.'


I am that by the light of which the world is illumined in the day and
the night also by the lamp, beause the Brahman is the source of all
light, agni or surya. He is the light through which the indriyas
function . When the eyes are closed, there is no perception, the
eyes implying perception through all indriyas, then the mind
functions with the help of the intellect , which in its turn
functions by the light of the atman, which is beyond body, mind and
intellect and that am I, the supreme reality, Brahman.

#Shankaracharya #Vedanta #Stotram
228004
ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ||
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||
(श्रीमद्भगवद्गीता २.६२-६३)

विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

A person who thinks solely about sense objects develops an attachment to them. Attachment leads to desire, and from desire arises anger. Anger induces delusion, and delusion leads to confusion of memory; from confusion of memory comes loss of intellect, and loss of intellect leads to outright perishment.

#Gita #Bhagwan #Shri_Krishna
374001
दुर्जन: सज्जनो भूयात्सज्जन: शान्तिमाप्नुयात् |शान्तो मुच्येत बन्धेभ्योमुक्तश्चान्यान् विमोचयेत् ||

May the wicked become gentle, May the gentle attain peace. May the peaceful get rid of the bondages, May the liberated liberate others
दुर्जन सज्जन हो जाए, सज्जन शान्ति प्राप्त करे।शान्त बंधनों से मुक्त हो,और मुक्त अन्यों को मुक्त करे।
3950014
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।
(गीता १७.१५)

उद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

#Gita #Bhagwan #Shri_Krishna
532002
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥
(मनुस्मृति ४.१३८)

सत्य बोले, प्रिय बोले, सत्य भी अप्रिय न बोले और प्रिय भी असत्य न बोले; यही सनातन (वेदमूलक होने से अनादि काल से चला आता हुआ) धर्म है।

#Manusmriti #Veda #Vedanta
514002
Photo
अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम्
अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना: ।
यत् सारभूतं तदुपासितव्यं
हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात् ।।

भावार्थ - पढने के लिए अनेक शास्त्र हैं और उनसे प्राप्त होने वाले ज्ञान की कोई सीमा नही है। मनुष्य की आयु अल्प है और बाधायें बहुत हैं। अतः जैसे हंस पानी मे से दूध निकाल लेता है, उसी तरह जीवन को दिव्य बनाने के लिये उन शास्त्रों का सार ग्रहण कर लेना चाहिए!!

#Gita #Bhagwan #Shri_Krishna #Shankaracharya #Vedanta
430003
संसार में सत्य के विपरीत ले जाने वाली कोई वस्तु यदि है तो वह कामना है। आदमी दुनिया में झूठ क्यों बोलता है? वह सोचता है कि अगर सच बोलेंगे तो हमारे मन के मुताबिक काम नहीं होगा - अपनी कामना पर जब चोट पड़ती दीखती है तब आदमी ईमानदारी से और सत्य से विचलित हो जाता है।

- ब्रह्मलीन स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी महाराज

#Swami_Akhandanand #Truth
437001
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैतत्प्रधार्यताम् ।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।।
(पद्मपुराण, सृष्टि. १९.३५५ , विष्णुधर्मोत्तर. ३.२५३.४४)

धर्म का सार सुनें और सुनकर इसे धारण करें।
(हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार आदि) जिस वर्ताव को अपने लिए नहीं चाहते, उसे दूसरों के प्रति भी नहीं करना चाहिए।

#Veda #Puran #Hindu
467001

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