स्पर्श-संकेत~~~💟💟
कहते हैं,
आत्माएँ जब जन्म बदलती हैं,
तो स्मृतियाँ पीछे छूट जाती हैं।
पर प्रेम...
वह कभी नहीं भूलता
पहले स्पर्श की दिशा।
शायद इसलिए
जब इस जन्म में
तुम पहली बार मेरे निकट आई,
हवा ने अचानक
रातरानी की ख़ुशबू ओढ़ ली,
और मेरी धड़कनों ने
ऐसे काँपना शुरू किया,
जैसे किसी सूफ़ी ने
बरसों बाद
अपने पीर की आहट सुन ली हो।
तुमने कुछ नहीं कहा।
बस
तुम्हारी उँगलियों की परछाईं
मेरी हथेली के पास से गुज़री,
और मेरी रूह में
एक बंद पड़ा दरवाज़ा
धीरे से खुल गया।
वह स्पर्श
त्वचा पर नहीं उतरा,
वह तो मेरी रूह के उस हिस्से तक पहुँचा,
जहाँ पिछले जन्म की
अनकही प्रार्थनाएँ
अब भी दीपक की लौ बनकर जल रही थीं।
मुझे लगा,
यह पहली मुलाक़ात नहीं,
यह तो सदियों पहले
अधूरी छूट गई
एक इबादत का
दूसरा सज्दा है।
तुम्हारी साँसों की नरम गरमाहट
जब मेरे क़रीब आई,
तो लगा
जैसे सावन की पहली फुहार
सूखी धरती को नहीं,
मेरे भीतर बरसों से प्रतीक्षा करती
किसी विरहिणी आत्मा को भिगो रही हो।
तुम्हारी मुस्कान—
वह कोई मुस्कान नहीं थी,
वह उस चाँद की चाँदनी थी
जो हर जन्म
मेरी अँधेरी रातों का रास्ता जानती रही।
मैंने तुम्हारी आँखों में देखा,
और वहाँ
अपने ही अधूरे जन्मों का प्रतिबिंब पाया।
ऐसा लगा,
मानो तुम्हारी पलकों की छाँव में
मेरी सारी भटकन विश्राम माँग रही हो।
उस क्षण
मैंने तुम्हें बाँहों में नहीं लिया,
मैंने तुम्हें
अपनी दुआओँ में समेट लिया।
क्योंकि कुछ प्रणय
स्पर्श से नहीं,
समर्पण से ही पूर्ण होते हैं।
और कुछ रतियाँ
देह में नहीं,
दो आत्माओं के बीच
बहती हुई ख़ामोशी में खिलती हैं।
उस दिन समझ आया—
पुनर्जन्म का पहला स्पर्श
हाथों से नहीं होता है,
बल्कि वह तब होता है,
जब दो रूहें
एक-दूसरे की उपस्थिति में
अपने अधूरे जन्मों की प्यास पहचान लेती हैं।
और तब
इश्क़,
सिर्फ़ प्रेम नहीं रहता—
वह ज़िक्र बन जाता है,
वह इबादत बन जाता है,
वह वह नूर बन जाता है
जिसे न मृत्यु बुझा पाती है,
न समय भुला पाता है।।
@kataizaharila









