खुद से की गई उम्मीदों का ये
आईना, जब कभी जरा सा भी
चटकता है,
तो किसी दूसरे की आवाज की
जरूरत नहीं पड़ती,
इंसान अंदर ही अंदर, चुपचाप
टूट जाता है,
ये कोई हौसला नहीं, बस एक
ऐसा सिलसिला है,
जहां इन्सान खुद ही अपना
मुंसिफ,
और खुद ही अपनी सजा बन
जाता है…🔥🥀💯
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@LoVeAaShiQ_SinGh
♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी°•❙❙♦
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