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मिर्ज़ा ग़ालिब

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‘ ग़ालिब ‘ कौन है पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है ? कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या 😏 Link for boost this channel- https://t.me/boost/mirza_galib

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Apr 4, 2026
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चैनल जानकारी

चैनल जानकारी
चैनल का नाममिर्ज़ा ग़ालिब
यूज़रनेम@mirza_galib
श्रेणीवायरल वीडियो
भाषाहिन्दी
देशभारत
सदस्य7,144
चैनल प्रकारपब्लिक चैनल
बनाया गया4 अप्रैल 2026
आखिरी अपडेट21 अक्टू॰ 2026 • कल
स्थितिसक्रिय

रैंकिंग

ग्लोबल रैंकिंग
#112259-10808
भाषा रैंकिंग
#721-82
श्रेणी रैंकिंग
#7276-778

सब्सक्राइबर वृद्धि

कुल: 7.1K30 Days growth: +1071.5%
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सब्सक्राइबर वृद्धि - 30 Days
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सब्सक्राइबर वृद्धि - Monthly
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September 20267,037
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नवीनतम पोस्ट

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मिर्ज़ा ग़ालिब

14 अक्टू॰ 2026, 23:24

जिन्हें मनाने में हमने उम्र गुज़ार दी,
वो हमारे बग़ैर भी ख़ुश थे—ये देर से जाना।
758009
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मिर्ज़ा ग़ालिब

14 अक्टू॰ 2026, 23:19

उम्रभर दूसरों की नज़र में अच्छे रहे,
एक दिन ख़ुद से मिले तो कई ऐब निकले।
शब्दार्थ:
ऐब — कमी, दोष
781004
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मिर्ज़ा ग़ालिब

14 अक्टू॰ 2026, 23:18

तेरी चाहत में अपनी हस्ती मिटा देते,
मगर मोहब्बत का ये मतलब तो नहीं होता।
774006
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मिर्ज़ा ग़ालिब

10 अक्टू॰ 2026, 23:40

ख़्वाहिशों के टूटने से ये फ़ायदा तो हुआ,
अब हर चमकती शय को हम जवाहर नहीं कहते।

शब्दार्थ:
शय — वस्तु, चीज़
जवाहर - अनमोल कीमती चीज़
1,4500016
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मिर्ज़ा ग़ालिब

10 अक्टू॰ 2026, 23:37

तअल्लुक़-ए-रूह भी अजीब सिलसिला है,
जिस्म दूर हो तो भी कुछ लोग भीतर रहते हैं।
1,410008
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मिर्ज़ा ग़ालिब

09 अक्टू॰ 2026, 23:39

तअल्लुक़ात-ए-दहर से रिहाई तो मिल गई,
मगर दिल अपने गुज़िश्ता दिनों से आज़ाद न हुआ।
शब्दार्थ:
तअल्लुक़ात — संबंध
दहर — संसार या काल
गुज़िश्ता — बीता हुआ
रिहाई — मुक्ति
1,550005
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मिर्ज़ा ग़ालिब

09 अक्टू॰ 2026, 23:30

इज़्तिराब-ए-दिल को सुकूँ समझते रहे हम,
ये कैसी कैफ़ियत थी कि ख़ुद से ही ग़ाफ़िल रहे।

शब्दार्थ:
इज़्तिराब — बेचैनी, व्याकुलता
ग़ाफ़िल — बेख़बर
1,500004
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मिर्ज़ा ग़ालिब

09 अक्टू॰ 2026, 23:29

शुऊर बढ़ा तो तअल्लुक़ कम होते गए,
हर शख़्स से मिले, मगर हर किसी के न हुए।

शब्दार्थ:
शुऊर — समझ, चेतना
तअल्लुक़ — संबंध
शख़्स — व्यक्ति
1,380004
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08 अक्टू॰ 2026, 23:44

हर शख़्स अपनी कहानी लिए फिरता है यहाँ,
किसी की आँख पढ़ो तो पूरी किताब मिलती है।
1,4200010
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मिर्ज़ा ग़ालिब

08 अक्टू॰ 2026, 23:30

हमें गुमाँ था कि हम ज़िंदगी को जान गए,
एक हादसा आया और तसव्वुर बदल गया।
शब्दार्थ:
गुमाँ — भ्रम/अनुमान
तसव्वुर — धारणा/कल्पना
1,490006
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मिर्ज़ा ग़ालिब

08 अक्टू॰ 2026, 23:28

अब न शिकवा है मुक़द्दर से, न कोई गिला वक़्त से..

जो मिला—उसे नेमत, जो गया—उसे तजुर्बा मान लिया...!
1,430005
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मिर्ज़ा ग़ालिब

07 अक्टू॰ 2026, 18:10

शामिल हैं जिन की साज़िशे तन्हाईयों में मेरी...😘

उन्हीं को शिकायत है कि हम महफ़िल में नहीं आते....!😘🥀
1,6400010
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मिर्ज़ा ग़ालिब

05 अक्टू॰ 2026, 22:49

तुझे खोकर भी तुझसे तअल्लुक़ कम न हुआ,
कुछ रिश्ते फ़ासलों से नहीं, वजूद से जुड़े होते हैं।
1,800009
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मिर्ज़ा ग़ालिब

05 अक्टू॰ 2026, 22:49

जो कल तलक ज़रूरत था, आज फ़िज़ूल लगता है,
ज़िंदगी भी अजीब तर्ज़ से तजुर्बा देती है।
1,750004
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04 अक्टू॰ 2026, 23:31

तेरी आँखों में अपना जहाँ देख लिया हमने,
अब दुनिया की ख़ूबसूरती से भला क्या लेना मुझे!
2,030003
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मिर्ज़ा ग़ालिब

04 अक्टू॰ 2026, 23:31

तेरे साथ गुज़रा हर लम्हा अज़ीज़ है,
वक़्त कम था मगर मोहब्बत बहुत थी।
2,010004
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मिर्ज़ा ग़ालिब

04 अक्टू॰ 2026, 23:31

तू मिला तो लगा मुक़द्दर मेहरबाँ है,
वरना हम तो हर ख़ुशी को इत्तिफ़ाक़ समझते थे।
2,020006
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मिर्ज़ा ग़ालिब

03 अक्टू॰ 2026, 23:19

हम आज भी उसी मोड़ पर ठहरे हैं,
जहाँ तुमने कहा था—“फिर मिलेंगे।”
2,110007
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मिर्ज़ा ग़ालिब

03 अक्टू॰ 2026, 23:17

वो पूछते हैं अब भी याद करते हो हमें?
हमने कहा—भूल जाते तो मोहब्बत कैसी।
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03 अक्टू॰ 2026, 23:17

हमने तो आख़िरी साँस तक तेरा इंतज़ार किया,
तू आया भी तो किसी और का होकर आया।
1,980006
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09 सित॰ 2026, 02:02

जिसे खोकर भी दिल बददुआ न कर सके,
समझ लेना मोहब्बत अभी कहीं ज़िंदा है।
1,760005
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09 सित॰ 2026, 02:02

मोहब्बत में कोई फ़ैसला आख़िरी कहाँ होता है,
दिल टूट भी जाए तो आरज़ू मरती नहीं।
1,720006
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09 सित॰ 2026, 02:02

*बेवफाओ के बाजार मे तुम वफ़ा ढूंढ़ते हो..
*बड़े नादान हो ग़ालिब..
*कातिल के घर मे ही जख्म की दवा ढूंढते हो.!!
1,8200011
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09 सित॰ 2026, 02:02

*दिल चाहता था कि उसकी हर ख़ता माफ़ कर दें,
*मगर ज़मीर ने कहा—हर माफ़ी रिश्ते नहीं बचाती।
1,8500017
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09 सित॰ 2026, 02:02

*हम चाहते तो आज भी उसे अपना कह देते,
*मगर कुछ रिश्ते चाहत से नहीं, क़दर से निभते हैं।
1,730009
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09 सित॰ 2026, 02:02

*मोहब्बत का तक़ाज़ा था कि तुझे पा लेते,
*ख़ुद्दारी ने कहा—जिसे क़दर न हो, उसे छोड़ दो!
1,8500015
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09 सित॰ 2026, 02:02

*ज़िंदगी ने पूछा, सबसे अज़ीज़ क्या है?
*हमने कहा—वो सुकूँ जो किसी के होने का मोहताज न हो।
1,8200015
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09 सित॰ 2026, 02:02

*हर जुदाई का मतलब बेवफ़ाई नहीं होता,
*कुछ फ़ासले मोहब्बत को उम्रभर महफ़ूज़ रखते हैं।
1,7300010
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09 सित॰ 2026, 02:02

*तेरी क़ुर्बत का असर अब भी रूह मे बाक़ी है,
*फ़ुर्क़त में भी दिल को तेरा ही गुमाँ रहता है।
1,750009
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09 सित॰ 2026, 02:02

*तेरी निगाहों की इनायत का क्या कहना,
*एक नज़र पड़ी और हम अपने न रहे।
1,690009

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