बुद्धि तो पिता जी के जाते ही खुल गई और आधी खुली जब तुम हुए ।" पापा आज अपनी पूरी भड़ास निकल देने के मूड में थे ।*
"तुम्हारे पैदा होने के बाद हमें समझ आया कि पिता जी वो दो जोड़ी धोती और गंजी में कैसे सालों बिता देते थे । ये जो तुम अमीर घरों के बच्चों के बीच पढ़ते हुए हमारे पैंट शर्ट पर शर्मिंगी महसूस करते हो, महंगा फोन चलाते हो, वो लैपटॉप जो लिए पढ़ने के लिए हो और चलाते गेम और फिल्में हो, ये कपड़े जूते, ये सब इसीलिए हैं क्योंकि हमारे पास सालों से सिर्फ़ चार जोड़ी कपड़े हैं । हम ऐश कर पाए क्यों कि हमारे पिता के पास केवल दो जोड़ी कपड़े थे । ऐसा थोड़े ना है कि हमारा मन नहीं करता बन ठन के रहने का, अच्छा पहनने अच्छा खाने का लेकिन हम मन मारते हैं सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हारे मन का हो सके और बदले में क्या चाहते हैं तो बस यही कि तुम पढ़ाई में अच्छा करो ।"
"पापा मैं....वो...।" इससे ज़्यादा वो कुछ बोल नहीं पाया ।
"हां हां, बताओ क्या वो ? अरे अब तो वो ज़माना भी नहीं रहा कि तुमको सिर्फ़ पढ़ने के लिए कहें । बताओ हमको कि पढ़ाई से ध्यान हटा कर तुम कौन से खेल या कला में आगे बढ़े हो ? बताओ कि हमारी मेहनत की कमाई, हमारे त्याग और हम जो अपने ही बच्चे से बेजती सहते हैं उसके बदले क्या मिला है हमको ?" बेटे के पास इसका कोई जवाब नहीं था । वो कैसे कहता कि उसका सार ध्यान तो खुद और अपने साथ के बच्चों के बीच का फर्क नापने में गया है ।
"तुम पढ़ाई में अच्छे हो, ये हम जानते हैं । ना होते तो हम कुछ कहते ही नहीं । तुम अच्छा कर सकते हो लेकिन दिक्कत पता है क्या है ? तुम ना अभी से हैसीयत नापने लगे हो । इतना क्रिकेट देखते और खेलते हो कभी ये नहीं सीखे कि पहले ही ओवर में 25 30 रन बना देने वाला बड़ा खिलाड़ी नहीं होता । बड़ा खिलाड़ी वो है जो अंत तक मैदान में खड़ा रहता है और जिसका कुल स्कोर उसकी टीम को जिताता है । बेटा शुरुआत कोई नहीं देखता यहां सबको अंजाम से मतलब है । अभी से हैसीयत देखोगे तो कुछ हाथ नहीं आएगा । अभी तो वक़्त है खुद की हैसीयत बनाने का । ध्यान दो वर्ना कुछ भी हासिल नहीं कर पाओगे ।" बेटा अभी भी सिर झुकाए वहां खड़ा था ।
"अब जाओ, इतना ही कहने को बुलाए थे । अभी समझ आ जाए तो अच्छा है वर्ना बाद में सिवाए पछताने के कुछ कर नहीं पाओगे ।" मां कुछ नहीं बोली बस पापा को देखती रही ।
अगले दिन पापा ऑफिस से आए तो बेटा सिर झुकाए सामने खड़ा था । पापा ने बैग टेबल पर रखा और अपने थके शरीर को सोफे पर पटक दिया ।
"पापा ।"
"हम्म्म्म ।"
"एडमिशन करा ली मैंने ।"
"अच्छी बात है । कौन से सबजेक्ट लिए हो ।"
"वही साइंस ही ।"
"इंटर में देख ही लिए हो कि साइंस नहीं हो पाएगा तो कुछ और देख लेते ।"
"फिर से इंटर में ही एडमिशन लिया है । एक साल तो बर्बाद जाएगा मगर इस बार अच्छे नंबर आएंगे । पूरी मेहनत करूंगा ।" बेटे ने डरते हुए कहा । पापा मुस्कराए
"पढ़ना तुमको है बेटा । हम बस ये चाहते हैं कि अच्छा बुरा के बीच का फर्क जान जाओ । और ध्यान रखना कि अगर मेहनत होती रहे तो साल कभी बर्बाद नहीं जाता ।" बेटा पिता की बातों को समझ गया था ये देख कर पिता को अच्छा लगा ।
कुछ देर बाद बेटा अंदर से एक लिफ़ाफ़ा ले कर आया और पापा को थमा दिया । पापा ने लिफ़ाफ़ा देखते पूछा "ये क्या है ?" इतना कहते हुए उन्होंने लिफ़ाफ़ा भी खोल लिया ।
"शर्ट है पापा । अपनी पॉकेट मनी से लाया हूं । समझ आ गया है कि आप मेरे लिए खुद की जरूरतों पर खर्च करने से भी डरते हैं लेकिन मैं तो अपने खर्च में कटौती कर के आपके लिए कुछ ला सकता हूं ना ।" पापा बेटे को देखते रहे । उनका मन हुआ कि उठ कर गले लगा ले उसे मगर इतना खुले नहीं थे ना उससे ।
"और मां के लिए ?" पीछे खड़ी मां ने खुद के आँसुओं को रोकते हुए कहा ।
"वो पापा ले आएंगे ना ।" इस बात पर सबके चेहरे पर हंसी आ गई ।
बेटा आगे क्या करेगा ये तो पता नहीं लेकिन अब से पापा की इज़्ज़त ज़रूर करेगा ये पक्का है ।
जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम।